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श्री शून्य पीठाधीश्वर: स्वामी सतीश मुनि की परत्परम् सिद्धी।

क्या आपको पता है?

(१) निराकार शून्य से साकार शून्य और फिर इसी से सृष्टि का निर्माण?

(२) शिव का जन्म पहले हुआ या शक्ति का?

(३)शिव शक्ति से भी बड़ा कोन है?(परतपरम)

(४)परमात्मा का नाम क्या है? जो समाधि से प्राप्त होता है?

(५) परमात्मा का कौन सा स्वरूप है जो आज तक किसी ने नहीं जान पाया शास्त्रों में खुलेआम लिखा है?

(६) मुक्ति और भक्ति दो अलग-अलग मार्ग हैं ?

उपर्युक्त सभी प्रश्नों को जानने के लिए मीडिया में जा कर के यूट्यूब निशान पर क्लिक करके वीडियो देखें।

स्वामी सतीश मुनि जी का जीवन परिचय

स्वामी सतीश मुनि का जन्म भारत देश के उत्तर प्रदेश प्रांत के जिला एटा में छोटे से गांव ककैरा में हुआ है। इनके पिताजी का नाम वीरेंद्र सिंह तथा माता का नाम कटोरी देवी है यह पांच भाई और एक बहन है। इन्होंने ५० वर्ष गृहस्थ जीवन में बिताया । उसके बाद किसी अज्ञात संत के कहने से सन्यासी हो गए। यह बचपन से ही फक्कड़ और संत स्वभाव केऔर साधक हैं। बचपन में कई बार यह घर से संन्यासी होने के लिए भाग गए ।संन्यासी होने से बचाने के लिए मां बाप ने इनकी शादी कर दी । लेकिन इनका गृहस्थी में कभी भी मन नहीं लगा। घर वाले इनके फक्कड़ पन, साधना, सुमिरन मैं हमेशा सहयोग करते रहते हैं। इनके मां-बाप भाई बंधु और पूरा समाज स्वामी जी के नाम से जानता है। सभी लोग स्वामी जी ही कहते हैं। अनेकों संतों के पास सत्संग करने के कारण २ वर्ष की उम्र से ३० वर्ष तक की उम्र तक सतगुरु की खोज में भटकते रहे। फिर सतगुरु आशुतोष महाराज से दीक्षा ग्रहण की। इनके फक्कड़ पन को देखते हुए सतगुरु आशुतोष महाराज ने इनका नाम मुनि रख दिया। क्योंकि स्वामी सतीश मुनी जी ,शरीर, मन, बुद्धि, आत्मा परमात्मा की बातें किया करते हैं ।सतगुरु आशुतोष से जब नाम लिया उस समय में सतगुरु आशुतोष महाराज के शिष्य दिल्ली में बहुत कम हुआ करते थे। हम लोग जमीन पर बैठकर के सत्संग सुना करते थे। दिल्ली के पीतमपुरा में गुरुजी से संपर्क होता था हमारे गुरुदेव आशुतोष महाराज हमेशा सत्संग करते थे तो लोग प्रश्न करते थे उसी के जवाब देते थे इसी कड़ी में बहुत सत्संग भी सुनाते थे। और कभी-कभी वैसे भी सत्संग सुनाया करते थे। गुरु जी का जो मिशन है उसका नाम है:- दिव्य ज्योति जागृति संस्थान, नूर महल, पंजाब, हेड ऑफिस है। उनके पूरी दुनिया में अनेकों आश्रम हैं । कुछ समय के बाद पता चला कि गुरुदेव समाधि में चले गए। गुरुजी नूर महल पंजाब में अभी भी फ्रिज में रखे हुए हैं। गुरु जी के समाधि के बारे में अनेकों अनेकों बातें बताई जाती हैं। गुरु जी ने किसी को कोई आदेश नहीं दिया है। गुरुजी हमेशा कहा करते थे कि प्रत्येक व्यक्ति तक ज्ञान को पहुंचा दो। गुरुजी के समाधि में जाने के बाद हमारे घर कोई साधु सन्यासी भिक्षा ग्रहण करने आए। तब बाबा जी ने हमारा सत्संग सुनकर कहा कि इस ज्ञान को जन-जन तक पहुंचा दो यह तुम्हारे गुरु का आदेश है। हमने उन सन्यासी बाबा से पूछा?आपको हमारे गरु कैसे मिल गए ? तब वह सन्यासी बोले कि आपको सब पता है कि गुरु कैसे मिल गए, आप बहाने बाजी मत करो, अपने गुरुदेव के आदेश का पालन करो। तुम पूर्वजन्म से ही सन्यासी हो, तुम बचपन से ही इस स्वभाव के हो, ऐसी बातें सुनकर मै भयभीत हो गया कि इस सन्यासी को मेरे बारे में कैसे पता चल गया। और मैंने बाबा जी से वचन भर लिया हामी भर ली। उसी दिन से वह संत महाराज समाधि में ज्ञान बताने लगे। आज भी वे मेरे गुरुदेव सतगुरु आशुतोष महाराज साथ-साथ रहते हैं। सतगुरुदेव हमेशा प्रश्नों के उत्तर देते रहते हैं क्योंकि प्रश्नों का उत्तर देना गुरुदेव का स्वभाव है।

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